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रेवाड़ी का इतिहास

रेवाड़ी का इतिहास / History of Rewari

दक्षिणी हरियाणा/ अहीरवाल का लंदन कहलाने वाला ऐतिहासिक नगर रेवाड़ी अपने अतीत में बहुत सी गौरव गाथाएँ समेटे हुए है| इस नगर का संबंध भगवान् श्रीकृष्ण से रहा है वहीं स्वामी दयानंद सरस्वती से भी इस नगर का संबंध है| यह नगर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से भी मुख्य रूप से जुड़ा हुआ है| 

नामकरण 

रेवाड़ी के नामकरण को लेकर दो मत प्रचलित हैं | कुछ लोगों का मानना है कि लगभग 5500 वर्ष पूर्व राजा रेवत ने अपनी पुत्री के नाम पर यह नगर बसाया था | उनकी पुत्री का नाम रेवती था जिसे वे प्यार से रेवा कहते थे। राजा रेवत ने अपनी राजकुमारी रेवती का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम/ बलभद्र से किया और विवाह के समय यह नगर उन्हें भेंट में दे दिया। रेवाड़ी को पहले 'रेवा-वाड़ी' कहा जाता था, जो कालान्तर में रेवाड़ी हो गया। 
दूसरा मत यह है कि अनरूत प्रदेश के राजा रेवत ने अपनी पुत्री का विवाह बलराम से किया था तब अपने राज्य का एक भू-भाग बलराम/ बलभद्र को विवाह में भेंट में दिया और बलराम ने इस भू-भाग के जंगल को साफ कराकर अपनी पत्नी रेवा के नाम से 'रेवा+वाडी' नगर बसाकर अपनी राजधानी बनाया|
नगर राजा रेवत ने बसाया या बलभद्र ने इस पर भले ही सहमती न हो, लेकिन बलराम की पत्नी और राजा रेवत की बेटी रेवती के नाम पर महाभारत काल में बसाया गया इस पर सभी सहमत हैं| 
रेवाड़ी में एक सराय का नाम बलभद्र सराय है, जिसके बारे में कहा जाता है कि जब भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ बाराती बनकर आये थे तो उन्हें इसी सराय में ठहराया गया था| नगर में एक मोहल्ले का नाम पांचावाला है, इसका संबंध भी लोग बलराम जी के विवाह से जोड़ते हैं और कहा जाता है कि बारात में आये पांचों पांडवों को यहीं ठहराया गया था| 
कहा जाता है कि बलराम जी का वंश नहीं चला तो पर द्वारिका से श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने रेवाड़ी आकर राज्य को पुर्नस्थापित किया|
बताया जाता है कि महाभारत के द्रोण पर्व में भी रेवाड़ी का चर्चा है | अध्याय 19 में श्लोक क्रमांक 5 से 10 में लिखा है कि आचार्य द्रोण ने महाभारत के युद्ध में गरूड़ आकार की व्यूहरचना की थी इसमें रेवाड़ी राज्य के आभीर गरूड़ के नेत्र स्थान में यानि सेना के अगले भाग में तैनात थे||

सम्राट हेमू 

रेवाड़ी राज्य में अनेक पराक्रमी राजा हुए है | दिल्ली की गद्दी पर बैठे हेमचन्द्र विक्रमादित्य, जिन्हें हेमू कहा जाता है, का जन्म रेवाड़ी में ही हुआ था| वह अपनी प्रतिभा के दम पर सूरी सम्राट आदिलशाह का प्रधानमंत्री बनने में सफल रहा|
हुमायूँ की मृत्यु होने पर हेमू बादशाह की ओर से युद्ध करने के लिए दिल्ली रवाना हुआ और ग्वालियर होता हुआ आगे बढ़ा और उसने आगरा तथा दिल्ली पर अपना अधिकार जमा लिया। इस विजय से हेमू के पास धन तथा एक विशाल सेना हो गई तो उसने अफगान सेना की कुछ टुकड़ियों को धन का लालच देकर अपने साथ मिला लिया और 7 अक्टूबर 1556 को खुद दिल्ली का सम्राट बन गया | 

रेवाड़ी को कई बार राज्य तथा जिला बनने का गौरव प्राप्त रहा है 1803 ई० में अंग्रेजों ने मराठों से संधि करने के बाद अंग्रेज बादशाह के मुखत्यार बनने के बाद उन्होने लैप्स की नीति के अन्तर्गत 1803 ई० से 1808 ई० तक रेवाड़ी को दिल्ली डिवीजन का जिला बना दिया| किन्तु रानी मायाकौर ने एक अपील अदालत में दायर करके पुन: रेवाडी राज्य का गौरव बहाल कराया|  प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में रेवाड़ी के राजा राव तुला राम और राव गोपालदेव की अग्रणीय भूमिका होने के कारण अंग्रेजों ने 1860-61 ई० में विभिन्न आदेशों से रेवाड़ी राज्य को जब्त करके संयुक्त पंजाब राज्य के गुड़गांव जिले के अन्तर्गत तहसील बना दिया| 1966 ई० में हरियाणा राज्य बनने के बाद 1972 ई० तक रेवाड़ी तहसील गुड़गांव जिले का हिस्सा बनी रही| 1972 ई० में रेवाड़ी को उप-मण्डल बना कर महेन्द्रगढ़ जिले में शामिल कर दिया गया| 1 नवम्बर 1989 ई० को रेवाड़ी जिला बना दिया गया |

1857 की क्रांति 

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रेवाड़ी का बहुत योगदान रहा| राजा राव तुलाराम और राव गोपाल देव के नेतृत्व में नारनौल ले पास स्थित नसीबपुर के मैदान में भारतीय सेना ने ब्रिटिश सेना को जबर्दस्त टक्कर दी और ब्रिटिश सेनापति जेरार्ड को मार गिराया| लगभग 5 हजार वीर भारतीय भी इस  युद्ध में काम आये| किन्तु ब्रिटिश सेना को कुछ देसी राजाओं से मदद मिल जाने के कारण ब्रिटिश सेना विजयी रही|

स्वामी दयानंद का आगमन

1872 में रेवाड़ी की गद्दी पर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक राजा राव गोपालदेव के पुत्र राव लालसिंह बैठे | राव लालसिंह के समय ही स्वामी दयान्द सरस्वती रेवाडी आये और 14 दिनों तक जन चेतना के ;लिए प्रचार किया| स्वामी जी ने इसी दौरान विश्व की सर्वप्रथम गऊशाला का निर्माण रेवाड़ी में करवाया।

रेवाड़ी के ऐतिहासिक स्मारक और सरोवर

रेवाड़ी के ऐतिहासिक स्थल- स्मारक और सरोवर 

महाभारतकालीन शहर रेवाड़ी अपने दामन में समृद्ध विरासत समेटे हुए है| यहाँ से सरोवर और धार्मिक स्थल इसके गौरवशाली अतीत की कहानी खुद कहते हैं| 

रेवाड़ी नगर के प्रमुख सरोवर

रेवाड़ी नगर के सरोवरों में से इस समय तीन प्रमुख सरोवर अस्तित्व में हैं | जिनमें सोलहराही, बड़ा तालाब या तेज सरोवर (तेज सागर) और नंदसागर (नंदसरोवर) शामिल हैं| 

1. सोलहराही 

शहर के सेक्टर एक, हाउसिंग बोर्ड कालोनी व महाराणा प्रताप चौक के बीच स्थित प्राचीनतम तालाब सोलहराही के मात्र अवशेष ही बचे हैं। कहा जाता है कि 17वीं व 18वीं सदी के मुगल साम्राज्य की दास्तान का मूक गवाह रहा यह तालाब जनता ने सामूहिक प्रयासों से चंदा इकट्ठा करके बनवाया था। समाजसेवी गंगाराम भगत की देखरेख में निर्माण कार्य हुआ। उस समय सोलह मार्ग यहां आकर मिलते थे, इसलिए इसका नाम सोलह राई (राही) पड़ गया। बुजुर्ग बताते हैं कि शहर का पानी खारा था, इसलिए पहले लोग सोलह राही स्थित कुओं से ही पेयजल लाते थे। 
कुछ दंतकथाओं के अनुसार, रुद्रसिंह ने इस ऐतिहासिक सरोवर का निर्माण कराया। 16 रास्तों के मिलान पर ढलान में स्थापित इस सरोवर को सोलह राही से ही जाना जाता है।
आज यह तालाब पूरी तरह से तबाह हो चुका है। जहां एक ओर इसकी प्राचीन कलात्मक दीवारें ढह चुकी हैं वहीं आजकल कहीं झुग्गियां तो कहीं मढ़ी आदि बनाकर इस पर चहुं ओर से अवैध कब्जे किए जा रहे हैं। इसमें विभिन्न मार्गों से आने वाले पानी के मार्गों को भी बंद किया जा रहा है। इसकी चारदीवारी जगह-जगह से तोड़कर इसमें से मिट्टी को उठाया जाना, इसके प्राचीन स्वरूप से छेड़छाड़ करने तथा इसमें जगह-जगह गोबर थापने के पथवारे बनाना जैसे इस प्राचीन धरोहर की खूबसूरती को बिगाड़ रहे हैं।

2. बड़ा तालाब या तेज सरोवर (तेज सागर)

शहर का दूसरा तालाब सन् 1806 में सोलहराही के करीब सौ साल बाद तत्कालीन राजा तेजसिंह ने एक लाख 83 हजार की लागत से बनवाया था। कहते हैं कि राव रामसिंह (द्वितीय) ने इस तालाब का निर्माण शुरू कराया, किन्तु उनकी मृत्यु हो जाने के कारण इसे राव तेजसिंह ने पूरा करवाया।
पेयजल समस्या को हल करने के लिए इस तालाब के चारों ओर पांच कुओं का निर्माण कराया गया। बड़े तालाब के नाम से प्रसिद्ध यह तेज सरोवर पहले तेज सागर कहलाता था। तेज सरोवर के किनारे ही प्रसिद्ध हनुमान मंदिर स्थित है।
इस ऐतिहासिक तालाब को भी जीर्णोद्धार की सख्त जरुरत है । इसकी विशाल दीवारों पर लगा चूना अब पत्थरों का साथ छोडऩे लगा है। कलात्मक कंगूरे व द्वार की महीन नक्काशी तिल-तिल कर नष्ट हो रही है। अवैध कब्जे लगातार बढ़ रहे हैं। नगर परिषद ने चारदीवारी ऊंची करवाकर इसकी दुर्दशा छिपाने की कोशिश अवश्य की।

3. नंदसागर (नंदसरोवर)

रेवाड़ी का तीसरा तालाब नंदसागर (नंदसरोवर) राजा नंदराम ने अपने शासनकाल में बनवाया था, जिसे क्षेत्र की जनता छोटे तालाब के नाम से जानती है। यहां प्राचीन मंदिर तथा राव गूजरमल व राव नंदराम की ऐतिहासिक छतरियां आज भी मौजूद हैं। ऐतिहासिक महल रानी की ड्योढ़ी से नंदसागर एक सुरंग द्वारा जुड़ा हुआ है। दिसंबर 1878 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने नंदसागर की छतरियों में प्रवचन दिए थे।
आर्य समाज की स्थापना व देश की पहली गौशाला के निर्माण के संदर्भ में स्वामी जी ने बैठकें यहीं कीं।
                                                                                                           -सत्यवीर नाहडिय़ा

धार्मिक स्थल- 

मनसा देवी मंदिर 

रेवाड़ी रियासत के राजा राव नाथूराम ने माँ मनसा देवी के मन्दिर का निर्माण पुत्र प्राप्ति के लिए करवाया था और उसमे माँ कांगड़ा देवी की प्रतिमा भी स्थापित की गई थी| 
रेवाड़ी नगर के मोहल्ला देवीस्थान स्थित मां मनसा देवी के इस मंदिर की उत्तर दिशा में शिव परिवार तथा हनुमानजी की मूर्तियां स्थापित हैं तथा इसकी पश्चिम दिशा में बाबा भैरु का एक प्राचीन मंदिर बना हुआ है।
मंदिर के परिसर में मां की सवारी के रूप में रथ को खड़ा करने के लिए रथखाने की विशेष व्यवस्था की गयी थी। नवरात्रों के पावन पर्व पर मां मनसा देवी की प्रतिमा को रथ में विराजमान कर भव्य शोभायात्रा नगर के मुख्य द्वारों व प्रमुख बाजारों से निकाली जाती थी। दूरदराज से श्रद्धालु इस रथयात्रा में शरीक होते थे तथा मंदिर में छत्र, पान, सुपारी व ध्वजा-नारियल के साथ मां की आराधना करते थे। 
इस परिसर में स्थापित मां मनसा देवी की उक्त ऐतिहासिक प्रतिमा को प्राचीन मूर्तिकला तथा कलात्मक कारीगरी का नायाब नमूना कहा जा सकता है। प्रतिमा के भव्य आभामंडल के अलावा इसके कंधों पर रिद्धि-सिद्धि तथा हर अंग पर विभिन्न देवी-देवताओं का कलात्मक पक्ष इसकी पुरातात्विक महत्ता को दर्शाता है। 

घंटेश्वर मंदिर

रेवाड़ी जिला के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में शहर के केंद्र में स्थित घंटेश्वर मंदिर भी शामिल है। इस मंदिर में विभिन्न देवी- देवताओं मूर्तियां स्थापित की गई हैं। यह तीन मंजिला मंदिर है जिसमें नगर के ही नहीं आसपास के लोग भी दर्शनार्थ आते हैं| 

भगवत भक्ति आश्रम 

रामपुर स्थित भगवत भक्ति आश्रम भी एक ऐतिहासिक स्थल है| जो किसी ज़माने में महिला शिक्षा का उत्कृष्ट केंद्र होता था| इस आश्रम की स्थापना रेवाड़ी के राजा राव बलबीर सिंह ने जनकल्याण और भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए उनसे पूर्व राजा रहे राव तेजसिंह द्वारा बनवाए गए उद्यान में की थी| इस आश्रम के नीचे एक हजार बीघा यानी लगभग सवा छ सौ एकड़ भूमि आती थी| 
आश्रम का संचालन एक ट्रस्ट द्वारा किया जाता था| आश्रम का प्रथम कुलपति परमहंस स्वामी परमानन्द सरस्वती को नियुक्त किया गया था|
इस आश्रम में शिक्षा, चिकित्सा और समाज सेवा की व्यवस्था की गई थी| शिक्षा गुरुकुल पद्धति पर आधारित थी| सभी वर्गों के विद्यार्थी गुरुकुल की तरह आवास में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे| यह संसथान ब्रह्मचारी विद्याध्यन पाठशाला कहलाता था|
आश्रम में विदित पद्धति पर आधारित स्त्री शिक्षा की सुंदर व्यवस्था थी| इसके कार्य से प्रभवित होकर प्रसिद्ध उद्योग पति जमनालाल बजाज ने अपनी बहन सुश्री मदालसा और पुत्री केशर देवी की शिक्षा ग्रहण करने के लिए आश्रम में भर्ती करवाया था| महात्मा गाँधी ने भी मीरा बहन को उत्तम शिक्षा दिलवाने के लिए इसी आश्रम को चुना| रेवाड़ी राजघराने की राजकुमारी सुमित्रा बाई ने भी शिक्षा ग्रहण की थी| 
कहते हैं मदन मोहन मालवीय, महात्मा गाँधी, पंडित नेहरु, गोविन्द वल्लभ पन्त, रवीन्द्रनाथ टैगोर, जमुनालाल बजाज और घनश्याम दास बिडला इसे शांति निकेतन से भी श्रेष्ठ और रमणीक बताते थे| सेठ घनश्याम दास बिडला ने तो आश्रम से ही प्रेरणा लेकर पिलानी में एक विशाल संस्थान का निर्माण किया जहां विज्ञान और तकनीक की शिक्षा भी दी जाती है| 
ब्रहमचारी और कन्या पाठशाला के अलावा आश्रम में विधवाओं और असहाय महिलाओं के लिए नारी निकेतन भी था| इसमें युवा महिलाओं के लिए शिक्षा तथा रोजी रोटी के साधन जुटाने का भी प्रबंध था| 
आश्रम में औषधालय था जिसमें निशुल्क दवाएं दी जाती थीं| इसके अलावा पुस्तकालय और छापाखाना की भी व्यवस्था थी| जीव जंतुओं के कल्याण के लिए पशु चिकित्सालय और पशुओं के लिए जलाशय भी था| 

स्वामी दयानंद गौशाला 

रेवाड़ी को देश की पहली गौशाला देने का गौरव भी हासिल है| जिसकी स्थापना आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने कर-कमलों से की थी। रेवाड़ी-नारनौल रोड़ पर राव गोपाल देव चौक से थोड़ा पहले बाईं ओर स्थित महर्षि दयानंद गौशाला के साथ स्वामी दयानंद के रेवाड़ी आगमन की अनमोल स्मृतियां जुडी हुई हैं|

लाल मस्जिद 

रेवाड़ी की पुरानी कचेहरी के पास एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक मस्जिद स्थित है| जिसे लाल मस्जिद के नाम से जाना जाता है| इस मस्जिद का निर्माण मुग़ल सम्राट अकबर के शासन काल में 1570 के आसपास हुआ माना जाता है| 
संभवत लाल पत्त्थर का प्रयोग किये जाने के कारण इसे लाल मस्जिद कहा जाता है| 
                                                                                                                 

नारनौल के दर्शनीय स्थल/ Tourist Place in Narnaul

नारनौल (महेंद्रगढ़) के ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल  

क्या-क्या देखें नारनौल में 

हरियाणा के किसी भी एक शहर में सर्वाधिक ऐतिहासिक स्मारक होने का गौरव नारनौल को हासिल है। यहाँ के ऐतिहासिक स्मारक अपने कलात्मक सौन्दर्य, स्थापत्य कला, ऐतिहासिक साक्ष्यों और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में नायाब हैं। इनमें प्राचीन काल की उच्चकोटी की स्थापत्यकला का अनोखा समावेश है। यहाँ के कुल 14 ऐतिहासिक स्मारकों में से 3 केन्द्रीय पुरातत्व तथा शेष 11 हरियाणा राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित हैं। यहाँं के प्रमुख स्मारकों में सम्राट शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित उनके दादा इब्राहिम खान का मकबरा, जल महल, शाहकुली खान का मकबरा, राय बालमुकुन्द का छत्ता जिसे बीरबल का छत्ता के नाम से जाना जाता है, तख्त वाली बावड़ी, चोर गुम्बद और शेख मिहिंरा की दरगाह आदि शामिल हैं। इनके अतिरिक्त यहाँ का चामुण्डा देवी मंदिर भी ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। महर्षि च्यवन की तपोभूमि ढोसी और माधोगढ़ का ऐतिहासिक किला भी इसी जिले की सीमा में आते हैं।

जलमहल 

नारनौल शहर के दक्षिण में आबादी से बाहर एक विशाल तालाब, जिसे खान तालाब कहा जाता है के बीच बना है प्रसिद्ध जलमहल। जिसे 1591 ई. में यहाँ के जागीरदार शाहकुली खान ने बनवाया था। महल के ऊपर पाँच छतरियाँ बनी हुई हैं। महल तक पहुँचने के लिए मेहराब दार पुल बना हुआ है। इस तालाब में दोहान नदी का जल आकर जमा होता था। वक्त के साथ इसमें मिट्टी जमा हो गई थी जिसे निकलवाकर इसमें नहरी पानी डालने की व्यवस्था की गई है तथा यहाँ एक पार्क विकसित किया गया है। 

चोरगुम्बद

शहर के उत्तरी-पश्चिमी दिशा में एक ऊँचाई वाले स्थान पर बना एक ऐतिहासिक स्मारक है-चोरगुम्बद। इसका निर्माण जमाल खां नामक पठान ने अपने मकबरे के रूप में करवाया था। किंतु ऐसी मान्यता है कि नगर से बाहर होने के कारण यह चोरों का आश्रय स्थल बन गया था। इसलिए इसका नाम चोर गुम्बद पड़ गया। यह एक विशाल गोलाकार गुम्बद है जिसकी छत को गोलाकार देकर बहुत ऊँचाई तक उठाया गया है। देखने में दो मंजिला भवन है, मगर ऊपरी मंजिल केवल बरामदा है, जिसके बीस द्वार हैं। यह भवन जीर्ण अवस्था में पहुँच गया था , मगर स्मारक के साथ लगते भू-भाग पर चौ.बसंीलाल की सरकार ने नेताजी सुभाष पार्क बनवाया था जिसके बाद यहाँ लोगों का आना-जाना बढ़ा तो सरकार ने भवन की भी मरम्मत करा दी। एक बार प्रशासन ने इस भवन का नामकरण साहुकार गुम्बद भी किया, मगर सत्ता परिवर्तन के साथ ही जिला प्रशासन ने फिर इसे चोर गुम्बद कहना शुरू कर दिया।

इब्राहिम खान का मकबरा

यह जिला शेरशाह सूरी की क्रिड़ास्थली रहा है। सम्राट शेरशाह सूरी ने नगर के दक्षिण-पश्चिम भाग में अपने दादा इब्राहिम खान के मकबरे का निर्माण करवाया था जो स्थापत्य कला के हिसाब से यहाँ के सभी स्मारकों से उत्तम है। अब शहर के बीच आ जाने से यहाँ तक पहुँचना कुछ मुश्किल हो गया है। इसमें लाल पत्थर और सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है। विशालकाय मकबरा आज भी अच्छी स्थिति में है और सूरी वंश की स्थापत्यकला का जीता-जागता नमूना है।

बीरबल का छत्ता

राय बालमुकुन्द द्वारा बनवाया गया छत्ता शहर के बीच में स्थित है। इसे बीरबल के छत्ते के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल राजकाल के सिलसिले में यहाँ आते थे और इस छत्ते में रहते थे। इसलिए इसका नाम बीरबल का छत्ता पड़ गया। यह दो मंंजिला भवन बनावट में किले और महल का समिश्रण नजर आता है। मरम्मत और उचित रखरखाव के अभाव में अब यह तिल-तिल कर नष्ट हो रहा है।

तख्त वाली बावड़ी 

यहाँ की दर्जनभर बावडिय़ाँ और आधा दर्जन विशाल तालाब सुविख्यात थे। इनमें खान तालाब, खलील तालाब, शोभा सागर, टिल्लूवाली, छोटा-बड़ा तालाब, बहादुर सिंह का तालाब आदि के अलावा कुछ कलात्मक बावड़ियाँ भी थी| जिनमें से कुछ अस्तित्व खो चुकी हैं और कुछ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं| इनमें तख़्त वाली बावड़ी प्रसिद्ध है जो शहर के पश्चिम में मोहल्ला मिश्रवाडा और छोटा-बड़ा तालाब के बीच स्थित है| इसके पास ही नागपुर वालों की बावड़ी भी है|

अन्य स्मारक

उपरोक्त ऐतिहासिक भवनों के अलावा यहाँ शाह्कुली खान का मकबरा, त्रिपोलिया या ईदगाह, शेख मिहरा की दरगाह आदि कई स्मारक हैं| 

माधोगढ का किला 

महेंद्रगढ़ से सतनाली मार्ग पर करीब 10 किलोमीटर दूर माधोगढ का किला अरावली की पहाड़ियों पर स्थित एक ऐतिहासिक किला है| इसका निर्माण सवाई माधोपुर के शासक सवाई माधोसिंह ने घाटियों के बीच पहाड़ी पर करवाया था जहां उनके सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त करते थे तथा अपनी युद्ध सामग्री भी संभाल कर रखते थे। इस किले में रानी के लिए एक बड़ा तालाब और घोड़ों के लिए घुड़साल भी बनवाए थे। पहाड़ों के बीच पेयजल के लिए एक कुंआ भी है। लगभग 300 फुट की ऊंचाई पर स्थित इस किले से दूर-दूर तक दुश्मन पर नजर रखी जा सकती थी| पहाड़ को काटकर इस स्थल तक सड़क का निर्माण भी करवाया गया है। इसे हरियाणा सरकार पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने के लिए प्रयासरत है|

महेंद्रगढ़ का किला 

महेंद्रगढ का किला अब पुरानी कचेहरी के नाम से जाना जाता है| लगभग 682 वर्ष पूर्व बनाया गया यह किला मराठाकाल की कला का अद्भूत नमूना है। किन्तु मराठा काल में निर्मित यह ऐतिहासिक किला अब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रहा है। जो किसी जमाने में अति सुरक्षित किला माना जाता था। इसके चारों ओर भूमिगत जलस्तर तक की गहरी एवं अत्याधिक चौड़ी खाई बनी हुई थी जिसके कारण इसे अभेद्य किला माना जाता था| यह किला भूमिगत सुरंग के माध्यम में नारनौल एवं माधोगढ़ के किलों से जुड़ा हुआ था । 
मराठों द्वारा निर्मित इस ऐतिहासिक किले में महाराजा नाभा के समय से जिला कारागार के अलावा उपमंडल स्तर के लगभग सभी विभागों के कार्यालय चलते थे जो अब नए स्थानांतरित कर दिए गये हैं| किले के चारों तरफ बनी खाई भी मिटटी से दशकों पहले भरवाई जा चुकी है| अब यह बंद पड़ा अपने जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है|

धार्मिक स्थल- 

धार्मिक स्थलों की बात करें तो महर्षि च्यवन की तपोभूमि ढोसी के अलावा यहाँ का चामुंडा मंदिर, मोड़ा वाला मंदिर, बामनवास-मौखूता के पास स्थित रामेश्वर धाम, कोजिंदा-बहरोड़ मार्ग पर स्थित कडियाँ वाला हनुमान मंदिर और हाल ही में निर्मित खालड़ा (रघुनाथपुरा) का केसरिया धाम लोगो के आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं| 

ढोसी तीर्थ

नारनौल से लगभग दस किलोमीटर दूर अरावली पर्वत श्रंखला की ढोसी पहाड़ी है जो महर्षि च्यवन की पतोभूमि और पवित्र तीर्थ स्थल है। पौराणिक कथा अनुसार इस तीर्थ का संबंध द्वापर युग से है। किवदंति है कि यहाँ महर्षि च्यवन ने सात हजार साल तपस्या की थी। महर्षि ने इस क्षेत्र में पाई जाने वाली जड़ीबूटियों से औषध तैयार की थी जिसे आज भी च्यवन प्राश के नाम से जाना जाता है। पहाड़ी के कुछ ऊपर चढऩे के बाद शिवकुण्ड आता है जहाँ भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है। लगभग 460 सीढिय़ाँ चढऩे के बाद पहाड़ी का शिखर आता है। जहां महर्षि च्यवन आश्रम व मंदिर हैं। यहीं चन्द्र कूप है जिसके बारे में मान्यता है कि उसमें सोमवती अमावस्या को पानी स्वयमेेव बाहर आता था, ऐसा संभवत ज्वार-भाटे के कारण होता होगा। अब भी यहाँ सोमवती अमावस्या के दिन भारी मेला लगता है और पवित्र स्नान के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

चामुंडा मंदिर 

चामुंडा देवी का यहाँ स्थित मंदिर सदियों पुराना है| आजाद चौक और किला रोड के बीच गोबिंद टाकिज वाली गली में स्थित यह मंदिर प्राचीन काल से लोगों की आस्था का केंद्र रहा है| मुस्लिम आक्रान्ताओं ने इस पर मस्जिद भी बनवा दी थी| लेकिन जीर्णोद्धार के बाद मंदिर पूजा और आस्था का केंद्र बना हुआ है, यहाँ मेला भी लगता है| 

नारनौल का इतिहास : एक नज़र

नारनौल का इतिहास 

-क्यों प्रसिद्ध है नारनौल 

-शेरशाह सूरी की जन्मस्थली है नारनौल 

नारनौल के इतिहास और नामकरण को लेकर कोई प्रमाणिक तथ्य नहीं मिलते, इसलिए विद्वान एकमत नहीं हैं, लेकिन यह एक इतिहासिक नगर है, इस बात से सभी इतिफाक रखते हैं| इसकी स्थापना और नामकरण को लेकर अनेक किवदंतियां और गाथाएं प्रचलित हैं| 
यहाँ के प्राचीन सूर्या नारायण मंदिर में मिले एक शिलालेख में इसका नामोलेख नंदीग्राम के रूप में किया गया है| भागवत पुराण में भी नंदी ग्राम का ज़िक्र है| इसलिए इस नगर को द्वापर कालीन कहा जाता है| 
पौराणिक गाथाओं के अनुसार नारनौल नगर महाभारत काल नरराष्ट्र के रूप में जाना जाता था|
यह भी प्रचलित है कि यह इलाका पहले भारी जंगल से ढका हुआ था और शेरों का ठिकाना था| जंगल साफ़ करके यहाँ नगर बसाया गया इसलिए इसका नाम नाहर नौल रखा गया जो कालांतर में नारनौल हो गया| 
एक मान्यता यह भी है कि करीब एक हजार वर्ष पूर्व दिल्ली के शासक अनंगपाल तंवर के रिश्तेदार राजा नूनकरण ने इस नगर को आबाद किया| 
राजा नूनकरण के समय नारनौल एक व्यापारिक केंद्र के रूप में जाना जाता था| मुग़ल बादशाह बाबर ने अपनी पुस्तक 'तुजके बाबरी' में यहाँ कपास मंडी होने का उल्लेख किया है| जिससे यह जाहिर होता है कि यहाँ कपास की खेती होती थी| बाबर ने यहाँ के बाजारों का चर्चा गुदड़ी के नाम से किया है| 
बारहवीं शताब्दी के पहले दो दशक तक यहाँ राजपूतों का ही शासन रहा| 12वीं शताब्दी के तीसरे दशक में मुस्लिम संत हजरत तुर्कमान यहाँ आया और उसके साथ ही मुसलमानों का यहाँ प्रभाव बढ़ने लगा| आखिर नारनौल मुस्लिमों के आधिपत्य में आ गया| 
पंद्रहवीं शताब्दी में नारनौल मुगलों के हाथों से निकल कर सूर अफगानों के नियंत्रण में आ गया| सबसे पहले शेरशाह सूरी के दादा इब्राहिम खान यहाँ आये| उन्हें फ़िरोज़-ए-हिसार के शासक ने नारनौल और इसके आसपास का क्षेत्र दिया था| इब्राहीम सूर का मकबरा आज भी नारनौल में मौजूद है और नारनौल के सभी स्मारकों से बेहतर स्थिति में है| इब्राहीम सूर की मौत के बाद उसका बेटा और शेरशाह सूरी का पिता हसनखान नारनौल का जागीरदार बना| इतिहासकार वी.स्मिथ के अनुसार शेरशाह का जन्म भी नारनौल में हुआ था| 
पानीपत की दूसरी लड़ाई के बाद यह इलाका अकबर के नियंत्रण में था और उसने सम्राट हेमू को गिरफ्तार करने के इनाम के तौर पर इसे शाह कुली खान को दे दिया| इसप्रकार शाह्कुली खान यहाँ का जागीरदार बना| जिसने नारनौल में जलमहल का निर्माण करवाया| अकबर के शासनकाल में ही यहाँ राय बालमुकुन्द के छत्ते का निर्माण हुआ जिसे बीरबल का छत्ता के नाम से जाना जाता है| 
अकबर के ज़माने में नारनौल में सिक्के बनाने की टकसाल भी स्थापित की गई थी, जिसका कामकाज देखने के लिए राजा टोडरमल भी यहाँ आते-जाते थे| 
औरंगजेब के शासन तक यहाँ अमन और शान्ति थी, किन्तु औरंगजेब के शासन में यहाँ की हिन्दू प्रजा पर मुस्लिम जागीरदारों ने ज्यादतियां करनी शुरू कर दी तो यहाँ के सतनामियों ने बगावत कर दी| शीघ्र ही यहाँ की जनता हिन्दू-मुस्लिम दो खेमों में बंट गई और यहाँ के मुस्लिम फौजदार ताहिर बेग को विद्रोहियों ने मारकर नगर पर कब्जा कर लिया| 
किसी लोक कवि का यह दोहा इसकी पुष्टि करता है-
सतनामी सत से लडे, ले हाथों में तेग|
नारनौल के गौरवे, मारयो ताहिर बेग||
औरंगजेब की मौत के बाद नारनौल पर जयपुर के राजपूतों ने कब्ज़ा कर लिया| लेकिन वह अधिक दिन नहीं रह सके | फ्रांसीसी जनरल डे-बोएगेन ने उन्हें हरा दिया|  कुछ ही समय में एक बार फिर मुसलामानों का नारनौल पर आधिपत्य हो गया जब मुर्तजा खान बडैच यहाँ के जागीरदार बने| कालान्तर में उनके वारिस अब्दुल रहमान का यहाँ नियंत्रण रहा| अब्दुल रहमान झज्जर के नवाब थे जिन्होंने 1857 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह में भाग लिया था| प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने नारनौल पटियाला के राजा नरेन्द्र सिंह को दे दिया| नरेन्द्र सिंह ने इस युद्ध में ब्रिटिश सेना की मदद की थी| 

हेरिटेज सिटी बनने के इंतज़ार में हरियाणा का ऐतिहासिक शहर नारनौल

हरियाणा का ऐतिहासिक शहर नारनौल : बनेगा हेरिटेज सिटी !

हरियाणा का ऐतिहासिक शहर नारनौल कभी शिक्षा, संस्कृति, अध्यात्म और स्थापत्य कला का केन्द्र रहा है। आज साधन और संसाधनों के अभाव मेंं यह क्षेत्र भले ही पिछड़े क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, मगर बीते युग में यह जिला वैभव की बुलंदियों को छूता था। महर्षि च्यवन की पतोभूमि, सम्राट शेरशाह सूरी की क्रिड़ास्थली और अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल की कर्मस्थली, संत कवि नितानंद की जन्मस्थली रहा ये इलाका अतीत में राजाओं, नवाबों और रईसोंं की राजधानी रहा है। यहाँ के प्राचीन भवन और सरोवर इसके वैभवपूर्ण अतीत को बखूबी ब्यान करते हैं।
दिल्ली-जयपुर रेलमार्ग पर दिल्ली से लगभग सवा सौ किलोमीटर पश्चिम-दक्षिण में स्थित ऐतिहासिक शहर नारनौल आज भूजल संकट ग्रस्त क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, मगर एक वक्त था जब यहाँ की दर्जनभर बावडिय़ाँ और आधा दर्जन विशाल तालाब सुविख्यात थे। आज भी प्रदेश के किसी भी एक शहर में सर्वाधिक ऐतिहासिक स्मारक होने का गौरव नारनौल को ही हासिल है। 
यहाँ के ऐतिहासिक स्मारक अपने कलात्मक सौन्दर्य, स्थापत्य कला, ऐतिहासिक साक्ष्यों और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में नायाब हैं। इनमें प्राचीन काल की उच्चकोटी की स्थापत्यकला का अनोखा समावेश है। यहाँ के कुल 14 ऐतिहासिक स्मारकों में से 3 केन्द्रीय पुरातत्व तथा शेष 11 हरियाणा राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित हैं। यहाँं के प्रमुख स्मारकों में सम्राट शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित उनके दादा इब्राहिम खान का मकबरा, जल महल, शाहकुली खान का मकबरा, राय बालमुकुन्द का छत्ता जिसे बीरबल का छत्ता के नाम से जाना जाता है, तख्त वाली बावड़ी, चोर गुम्बद और शेख मिहिंरा की दरगाह आदि शामिल हैं। इनके अतिरिक्त यहाँ का चामुण्डा देवी मंदिर भी ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। महर्षि च्यवन की तपोभूमि ढोसी और माधोगढ़ का ऐतिहासिक किला भी इसी जिले की सीमा में आते हैं।
नारनौल शहर के दक्षिण में आबादी से बाहर एक विशाल तालाब, जिसे खान तालाब कहा जाता है के बीच बना है प्रसिद्ध जलमहल। जिसे 1591 ई. में यहाँ के जागीरदारर शाहकुली खान ने बनवाया था। महल के ऊपर पाँच छतरियाँ बनी हुई हैं। महल तक पहुँचने के लिए मेहराब दार पुल बना हुआ है। इस तालाब में दोहान नदी का जल आकर जमा होता था। वक्त के साथ इसमें मिट्टी जमा हो गई थी जिसे निकलवाकर इसमें नहरी पानी डालने की व्यवस्था की गई है तथा यहाँ एक पार्क विकसित किया गया है। 

शहर के उत्तरी-पश्चिमी दिशा में एक ऊँचाई वाले स्थान पर बना एक ऐतिहासिक स्मारक है-चोरगुम्बद। इसका निर्माण जमाल खां नामक पठान ने अपने मकबरे के रूप में करवाया था। किंतु ऐसी मान्यता है कि नगर से बाहर होने के कारण यह चोरों का आश्रय स्थल बन गया था। इसलिए इसका नाम चोर गुम्बद पड़ गया। यह एक विशाल गोलाकार गुम्बद है जिसकी छत को गोलाकार देकर बहुत ऊँचाई तक उठाया गया है। देखने में दो मंजिला भवन है, मगर ऊपरी मंजिल केवल बरामदा है, जिसके बीस द्वार हैं। यह भवन जीर्ण अवस्था में पहुँच गया था , मगर स्मारक के साथ लगते भू-भाग पर चौ.बसंीलाल की सरकार ने नेताजी सुभाष पार्क बनवाया था जिसके बाद यहाँ लोगों का आना-जाना बढ़ा तो सरकार ने भवन की भी मरम्मत करा दी। एक बार प्रशासन ने इस भवन का नामकरण साहुकार गुम्बद भी किया, मगर सत्ता परिवर्तन के साथ ही जिला प्रशासन ने फिर इसे चोर गुम्बद कहना शुरू कर दिया।
यह जिला शेरशाह सूरी की क्रिड़ास्थली रहा है। सम्राट शेरशाह सूरी ने नगर के दक्षिण-पश्चिम भाग में अपने दादा इब्राहिम खान के मकबरे का निर्माण करवाया था जो स्थापत्य कला के हिसाब से यहाँ के सभी स्मारकों से उत्तम है। अब शहर के बीच आ जाने से यहाँ तक पहुँचना कुछ मुश्किल हो गया है। इसमें लाल पत्थर और सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है। विशालकाय मकबरा आज भी अच्छी स्थिति में है और सूरी वंश की स्थापत्यकला का जीता-जागता नमूना है।
राय बालमुकुन्द द्वारा बनवाया गया छत्ता शहर के बीच में स्थित है। इसे बीरबल के छत्ते के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल राजकाल के सिलसिले में यहाँ आते थे और इस छत्ते में रहते थे। इसलिए इसका नाम बीरबल का छत्ता पड़ गया। यह दो मंंजिला भवन बनावट में किले और महल का समिश्रण नजर आता है। मरम्मत और उचित रखरखाव के अभाव में अब यह तिल-तिल कर नष्ट हो रहा है।
नारनौल से लगभग दस किलोमीटर दूर अरावली पर्वत श्रंखला की ढोसी पहाड़ी है जो महर्षि च्यवन की पतोभूमि और पवित्र तीर्थ स्थल है। पौराणिक कभा के अनुसार इस तीर्थ का संबंध द्वापर युग से है। किवदंति है कि यहाँ महर्षि च्यवन ने सात हजार साल तपस्या की थी। महर्षि ने इस क्षेत्र में पाई जाने वाली जड़ीबूटियों से औषध तैयार की थी जिसे आज भी च्यवन प्राश के नाम से जाना जाता है। पहाड़ी के कुछ ऊपर चढऩे के बाद शिवकुण्ड आता है जहाँ भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है। लगभग 460 सीढिय़ाँ चढऩे के बाद पहाड़ी का शिखर आता है। जहां महर्षि च्यवन आश्रम व मंदिर हैं। यहीं चन्द्र कूप है जिसके बारे में मान्यता है कि उसमें सोमवती अमावस्या को पानी स्वयमेेव बाहर आता था, ऐसा संभवत ज्वार-भाटे के कारण होता होगा। अब भी यहाँ सोमवती अमावस्या के दिन भारी मेला लगता है और पवित्र स्नान के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।
यह वीरों और बहादुरों का क्षेत्र है यहाँ के सतनामी तो इतिहास प्रसिद्ध हैं ही, जिन्होंने औरगंजेब से टक्कर ली थी। सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी यहाँ के वीर यौद्धाओं ने राव राजा तुलाराम क नेतृत्व में गाँव नसीबपुर के मैदान में ब्रिटिश सेना को सबसे कड़ी चुनौती दी थी और अंग्रेज सेनापति जेरार्ड को मार गिराया था। यहां लगभग पाँच हजार वीर यौद्धाओं ने अपना बलिदान दिया था। देश को सर्वाधिक सैनिक देने का श्रेय भी महेन्द्रगढ़-रेवाड़ी क्षेत्र को ही जाता है। रेजांगला के युद्ध में लडऩे वाले वीर भी इसी क्षेत्र के थे।
वीर सूरमाओं की इस धरती ने संत भी पैदा किये हैं। संत कवि के रूप में विख्यात संत नितानंद, जिनका डिघल में आश्रम है का जन्म नारनौल में ही हुआ था। योग को पुन: लोकप्रिय बनाने वाले योगाचार्य स्वामी रामदेव भी इसी जिले के गाँव सैदअलिपुर में पैदा हुए हैं। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला का जन्म भी इसी जिले में हुआ था, जब उनके पिता यहाँ सेवारत थे। उत्तरांचल के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी का जन्म भी नारनौल के मोहल्ला मिश्रवाड़ा में ही हुआ था। इस क्षेत्र ने डॉ.जे.एस.यादव जैसे जीव वैज्ञानिक को भी जन्म दिया है, जिन्होंने अन्तर्र्राष्ट्रीय स्तर पर देश का गौरव बढ़ाया।

1857 की क्रांति का प्रमुख केंद्र रहा नारनौल

प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नारनौल का योगदान  

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में दिल्ली में भारतीय सेना की पराजय के बाद ब्रिटिश सरकार ने गुडगाँव में क्रांतिकारियों के दमन के लिए 2 अक्टूबर,  1857 को ब्रिगेडियर जनरल शावर्स के नेतृत्व में सेना भेजी| जिसने सबसे पहले रेवाड़ी पर आक्रमण किया| किन्तु राजनीति के चतुर खिलाडी राव तुलाराम ने रेवाड़ी पहले ही छोड़ दी थी| हडसन के शब्दों में-"पक्षी उड़ गया है और घोंसला खाली पड़ा है| वह बहुत चतुर व्यक्ति था और उसने बड़ी तैयारी कर राखी थी और यदि दिल्ली में हमारी हार हो जाती तो इस क्षेत्र में हमारा विनाश करने वाला वह पहला शख्स होता| इसकी सैनिक तैयारी कमाल की है| सभी प्रकार से शस्त्र, तोपें, छकड़े और बारूद यहीं बनाते हैं| यहाँ बहुत अच्छी फाउंड्री लगी हुई हैं| वास्तव में इसने काफी कुछ कर लिया था| यहाँ कुछ ही महीनों में इसकी स्थिति इतनी मजबूत हो जाती कि आसपास के क्षेत्र पर इसका अधिकार हो जाता और यह पटियाला, जींद जैसा बड़ा राज्य स्थापित कर लेता|" 

रेवाड़ी के बाद शावर्स ने झज्जर पर आक्रमण किया और वहां के नवाब अब्दुर्रहमान खां को बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया| इसके बाद फरुखनगर और बल्लबगढ़ पर हमला किया और फरुखनगर के नवाब अहमद अली और बल्लबगढ़ के राजा नाहर सिंह को भी बंदी बनाकर दिल्ली ले गया| जैसे ही शावर्स दिल्ली गया हरियाणा के सभी बचे हुए क्रांतिकारियों ने मिलकर एक साथ लड़ने की योजना बनाई और इसके लिए नारनौल को चुना गया| इन क्रांतिकारियों में हिसार के शहजादा आजिम, झज्जर के नवाब के दामाद जर्नल समद खां और राव तुलाराम के अलावा जोधपुर के देशभक्त भी शामिल थे|

जब इस गठबंधन की खबर ब्रिटिश सरकार को मिली तो इन्हें कुचलने के लिए कर्नल जेरार्ड के नेतृत्व में सेना भेजी गई| इस सेना ने 16 नवम्बर को नारनौल पर चढ़ाई कर दी| उस समय भारतीय सेना एक किलानुमा सराय में डटी हुई थीं| भारतीय सेना लगभग पांच हजार सैनिकों की थी और उनके पास पांच-सात मध्यम दर्जे की तोपें भी थी| जैसे ही ब्रिटिश सेना के आने की सूचना मिली राव तुलाराम के नेतृत्व में भारतीय सेना किला छोड़ कर शहर से बाहर आ गई और नसीबपुर गाँव के पास ब्रिटिश सेना पर टूट पड़ी|

नसीबपुर के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ | देशभक्त सेना बेहद वीरता से लड़ी युद्ध में भारतीय सेना नायक राव किशन सिंह, राव रामलाल, शहजादा मुहम्मद आजिम तथा जनरल समद खां का पुत्र शाहीद भी शहीद हो गए| किन्तु वीर भारतीयों ने ब्रिटिश सेनापति जेरार्ड को भी मौत की नींद सुला दिया| कौलफील्ड ने ब्रिटिश सेना की कमान संभाली और उसने अपनी सेना को तोपों के मुंह खोल देने का आदेश दिया | जिसके बार ब्रिटिश तोपों ने आग उगलना शुरू किया तो भारतीय सेना दो हिस्सों में बंट गई कुछ सैनिक तोपों की रेंज से बाहर जाने के लिए पीछे हट गए  तो कुछ तोपों के बिलकुल पास पहुँच गए| जो सेना बिलकुल तोपों के निकट आ गई थी उसपर ब्रिटिश सेना ने अचानक हमला बोल दिया| भारतीय पूरी ताक़त से लड़े किन्तु कम संख्या और कम तोपों के कारण ब्रिटिश सेना का अधिक देर मुकाबला नहीं कर सके और दिन ढलते ही ब्रिटिश सेना ने यह युद्ध जीत लिया| नारनौल के युद्ध की समाप्ति के साथ ही हरियाणा में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का अंत हो गया|

इस युद्ध में भारतीय सेना की हार भले ही हुयी लेकिन अंग्रेजों को भी भारी नुकसान हुआ, क्योंकि भारतीय बड़ी वीरता से लड़े | खुद अंग्रेजों ने इसका उल्लेख किया है| होम्स लिखता है-"शत्रु ने गाइड्स तथा कारबायनियर्स के आक्रमण को बहदुरी से झेला|"

मालेसन लिखता है-"यह एक वीरतापूर्ण युद्ध था| शत्रु इतने साहस और वीरता से पहले कभी नहीं लड़े थे| वे न घबराये न डरे| हम पर इतना भीषण प्रहार पहले कभी नहीं हुआ| ब्रिटिश सेनाओं ने आज तक ऐसी भयानक टक्कर किसी भी शत्रु से न ली होगी|" वह आगे लिखता है-"उन्होंने बहादुरी से अपनी जानें न्यौछावर कर दी| सरेंडर करने का तो विचार तक नहीं किया|"

इस युद्ध में लगभग पांच हजार वीर योद्धाओं ने अपना बलिदान दिया| राव राजा तुलाराम अपनी सेना को पुनर्गठित करने के लिए राजस्थान की ओर चले गए और वहां से भारतीय राजाओं के प्रतिनिधी के रूप में अफगानिस्तान होते हुए रूस के तत्कालीन शासक जार से सहयोग की अपील करने के लिए इंतज़ार करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए|


नारनौल के सतनामी जिन्होंने औरंगजेब को नाकों चने चबवाए थे

सतनामियों का इतिहास 

-कौन थे सतनामी, क्यों हुआ औरंगजेब से युद्ध 

सतनामियों का विद्रोह मुग़लकालीन भारतीय इतिहास की एक बहुत महत्त्वपूर्ण घटना है| बहुत कम संख्या में होने के बावजूद उन्होंने जिस तरह दिल्ली के बादशाह को चुनौती दी वह बेहद वीरता पूर्ण कार्य था| आखिर सतनामी कौन थे?
इतिहासकार इन्हें भक्ति आन्दोलन की उपज मानते हैं| भक्ति आन्दोलन को अहीरवाल क्षेत्र में सही ढंग से चलाने के लिए बने संगठन को लोग सतनामी, साध या मूडिया कहते थे| इतिहासकारों का यह भी मानना है कि यह संगठन संत रैदास द्वारा चलाये गए रैदासी संगठन की एक शाखा थी| इतिहासकार डॉ.के.सी. यादव के अनुसार इस संगठन की स्थापना भक्त वीरभान ने 1543 ई. में की थी| 
सतनामी नाम के अनुसार सच्चे और चरित्रवान तो थे ही वे बहुत बहादुर भी थे| खाफिखां के शब्दों में-"यद्यपि ये लोग फकीरों की तरह रहते हैं, किन्तु इनमें से अधिकांश या तो खेतीबाड़ी करते हैं या छोटे-मोटे व्यापारिक धंधे| अपने संगठन के सिद्धांतों के अनुसार ये लोग सच्चे नाम के साथ जीना चाहते हैं और कभी भी बे-ईमानी या अन्याय से धन नहीं कमाते| इन पर कोई अत्याचार करे तो ये बरदास्त नहीं करते| इनमें से अधिकांश लोग सदैव हथियारों से लैस होकर घूमते हैं|"
सच और शांति के साथ जीने वाले सतनामी एक छोटी-सी घटना से बागी हो गए और इनकी बगावत ने दिल्ली का तख़्त हिला कर रख दिया| डॉ. के.सी.यादव के अनुसार 1672 में एक सतनामी और सरकारी बीच हुयी कहासुनी में सरकारी प्यादे ने सतनामी के सिर में लाठी मार दी, सतनामी के शोर मचने पर सतनामी इकट्ठा हो गए और सरकारी प्यादे को बुरी तरह मारा| घटना की जानकारी जब नारनौल के शाही अफसर जिसे शिकदार कहते थे, को मिली तो उसने सतनामियों को सजा देने के लिए सैनिक भेजे | किन्तु सतनामियों ने इस सैनिक टुकड़ी को पीटकर हथियार छीन लिए और मुग़ल साम्राज्य के खिलाफ धर्मयुद्ध का एलान कर दिया| 
सतनामियों ने यहाँ के फौजदार ताहिर खां की सेना को बुरी तरह से हरा कर नारनौल पर कब्ज़ा कर लिया| सतनामियों ने मस्जिदों को ढहा दिया, मुग़ल खज़ाना लूट लिया और अपनी सरकार बनाकर पूरी व्यवस्था अपने हाथ में ले ली| मुग़ल साम्राज्य के सभी चिह्न मिटा दिए और मालगुजारी वसूलने लगे| 
जब इस विद्रोह और सतनामियों की बहादुरी के बात सुनी तो औरंगजेब भी चिंतित हो गया| उसने 15 मार्च 1672 को एक विशाल सेना शहजादा मुहम्मद अकबर और कुछ वरिष्ठ सेनापतियों के नेतृत्व में नारनौल भेजी| विशाल सेना होने के बाद भी मुग़ल सैनिक सतनामियों से भयभीत थे| क्योंकि किसी बूढी महिला ने सतनामियों से कह दिया कि उसने ध्वजा पर मंत्र फूंक दिया है, जो भी सतनामी इस ध्वजा के निचे लडेगा उस पर शत्रु के हथियारों का कोई प्रभाव नहीं होगा| और कोई मारा भी तो उसके स्थान पर 80 सतनामी खड़े हो जायेंगे| इस मंत्र और बहादुरी का जब औरंगजेब को पता चला तो उसने खुद अपने हाथो से कुछ लिखकर अपनी सेना की ध्वजा में सिलवाया तब कहीं जाकर मुग़ल फ़ौज सतनामियों से लड़ने को तैयार हुई| 
जैसे ही मुग़ल सेना नारनौल के पास पहुंची सतनामी उन पर भूखे शेर की तरह टूट पड़े| एक बारगी तो उनका रणकौशल और बहादुरी देखकर मुग़ल सेनापति भी घबरा उठे थे, किन्तु विशाल सेना और अच्छे हथियार होने के कारन सतनामी बहुत देर तक सेना का मुकाबला नहीं कर सके| एक-एक कर लगभग पांच हजार सतनामी शहीद हो गए किन्तु मुग़ल सेना को एक कदम आगे नहीं बढ़ने दिया| किन्तु अंततः मुग़ल सेना विजयी रही| पांच हजार सतनामी ही इस युद्ध में नहीं मरे लगभग 15 हजार की मुग़ल सेना में से भी बहुत कम सैनिक और सेनापति जीवित बच सके| 
युद्ध की समाप्ति के बाद जिन्दा बचे सतनामी शासन के प्रतिशोध से बचने के लिए किसी सुरक्षित स्थान पर चले गए| किन्तु उनके द्वारा शुरू की गई अत्याचार के खिलाफ बगावत की परंपरा यहाँ आज भी जारी है|